अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू आलि जनाब डॉ. समीर साहब, अल्लाह तआला आपको दोनों जहाँ की तमाम नेमतों, रहमतों और अपनी खास करम नवाज़ियों से सरफराज फरमाए। आपने जिस तरह अलीमों की गुरबत, उनकी बेबसी और दर्द को महसूस किया और इस गुनहगार की खामोशी से खिदमत की, वह मेरे लिए सिर्फ एहसान नहीं बल्कि एक ऐसी नेकी है जिसे अल्फाज़ में बयान करना मुश्किल है। जब कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी, उस वक्त आपका साथ और आपकी मदद मेरे लिए अल्लाह की रहमत बनकर आए। आपने सिर्फ इलाज नहीं कराया, बल्कि टूटे हुए दिल को हिम्मत दी, और मायूसी को उम्मीद में बदल दिया। अल्लाह तआला आपकी इस खिदमत को अपनी बारगाह में कबूल फरमाए और आपको इसका ऐसा अज्र अता फरमाए जो कभी खत्म न हो। अल्लाह आपके हर कदम पर अपनी रहमतों की चाव अता फरमाए , आपकी हर परेशानी को आसानियों में तब्दील फरमान, और हर ग़म को खुशी में तब्दील फरमा दे। मेरी दिल से ये दुआ है कि जब भी अल्लाह अपने बंदों के मुकद्दर लिखे, तो उसमें सबसे पहले आपके लिए। और आप के टिम केलिए खुशियों, कामयाबी और सलामती के फैसले लिख दे। अल्लाह आपको हमेशा नेक रास्तों पर कायम रखे और आपको गरीबों, मुस्कीनों और हर मुसीबतजदा इंसान की मदद करने की तौफीक आता फरमाए, क्योंकि आप जैसे लोग ही इस दुनिया में अल्लाह की रहमत का जरिया बनते हैं। आमीन या रब्बुल आलमीन।